सर पर बांध ली पगड़ी
जेब में रखी कटार
चल दिए सरदारजी
याद करते हुए सिखों दी शान

अल्लाह के बन्दे हैं
सुबह शाम पढें नमाज़
राज किये थे कुर्सी पे
अकबर शहाजान – ए – खास

फिर आए थे अंग्रेज़
बसा गए रगों में ईसाई
चर्च खुले जीजस छाए
इनहोने भी यहाँ अपने घर बसाए

यहाँ हिन्दुत्व की मिट्टी है
भगवान के नाम पर जानें बिकती हैं
दिन रात इनके दिलों में नाम
शिव-हरी-हनुमान और राम

भारत के रहने वाले थे
अनेक इनके नारे थे
हिन्दु-मुस्लिम-सिख-ईसाई
इनहोने इंसानों पर बाधा लाई

बट गया यह देश हमारा
इंसानियत कहीं कोसों दूर
धर्म – रिवाज़ के चक्कर में
आखिर हो ही गई ना भूल?
©poetry_speaks

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